Tuesday, April 19, 2011

खोये शब्द

शब्द छूटे थे सभी
वे मौन से समझदार जो ना थे
अतीत को फुसला कर
व्याकरण में
संजो कर रखा करते थे
स्मृति को परिभाषा में
बाँध कर रखा करते थे
कुछ छूटे कुछ छोड़ दिए
यूँ ही
अपनी बात कहना भी हम भूल गए
............
आज तूफान ही ने झकझोरा है
बारिश ने शब्दों को फिर पुकारा है
नन्हे कोंपल से ये ज़मीं से निकल आये हैं
केंचुए से ये रेंगते भी दिखते हैं
बात जो खत्म थी
उनपर फफूँद से उग आये हैं
गलती लकड़ी पर भी
मशरूम सी है छतरी खोली....

.........
शब्द आकुल हैं
जीवन अभी जारी है
कविता लिखने को कई...
अभी बाकी है....

3 comments:

shikha varshney said...

गहन भाव लिए बेहतरीन रचना.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ...

mahendra srivastava said...

वाकई बहुत बढिया