शब्द छूटे थे सभी
वे मौन से समझदार जो ना थे
अतीत को फुसला कर
व्याकरण में
संजो कर रखा करते थे
स्मृति को परिभाषा में
बाँध कर रखा करते थे
कुछ छूटे कुछ छोड़ दिए
यूँ ही
अपनी बात कहना भी हम भूल गए
............
आज तूफान ही ने झकझोरा है
बारिश ने शब्दों को फिर पुकारा है
नन्हे कोंपल से ये ज़मीं से निकल आये हैं
केंचुए से ये रेंगते भी दिखते हैं
बात जो खत्म थी
उनपर फफूँद से उग आये हैं
गलती लकड़ी पर भी
मशरूम सी है छतरी खोली....
.........
शब्द आकुल हैं
जीवन अभी जारी है
कविता लिखने को कई...
अभी बाकी है....
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3 comments:
गहन भाव लिए बेहतरीन रचना.
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ...
वाकई बहुत बढिया
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