Wednesday, April 20, 2011

मध्यवर्गीय लड़की

बस की भीड़ में फँसी हुई
लेडिस कंपार्टमेंट में खड़ी हुई
हमेशा थोड़ी जल्दी में
कुमकुम में और हल्दी में

आटे में पानी कितना हो
और दिया की बत्ती कैसी हो
सास की चाय की शक्कर और
टीके लगवाने के चक्कर सब

चश्मे के पीछे आम शक्ल
पर कर्मठ तन, बेजोड़ अक्ल
कार चलाना सीखती है
शेरिंग ऑटो से आती है

यह लोग जो इसके साथ खड़े
सब फ्रेम में अच्छे लगते हैं
पर चहकती सी वह आम हँसी
सब फ्रेम बदलना जानती है


नज़दीक से देखो जब उसको
थोड़ी दिवानी लगती है
अपनों के सुकून के खातिर
जान दाँव पर लगा आ जाती है


भूचाल कहीं
आक्रोश कहीं
अखबार में सब छपते हैं
खामोश सी ये बात जो चल निकली
आँधी में नक्शे ढह जायें

जाओ पत्री सब पढ़ आओ
तकदीर बदलने वाली है
कोई विद्रोह नहीं ना अनशन है
बस इनकी फसल तैयार खड़ी....

8 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

एक मध्यमवर्गीय लडकी का सही खाका खींचा है ..अच्छी प्रस्तुति

वन्दना said...

बहुत सुन्दर रचना।

nivedita said...

beautiful presentation .....

डॉ .अनुराग said...

मिलती जुलती कई कविताएं पढ़ी है इस विषय पर...... ओर सब भली लगी है

चैतन्य शर्मा said...

Happy Birth Day to youuuu.....dher sara pyar...

Sawai Singh Rajpurohit said...

सर्वप्रथम जन्मदिन की बहुत सारी शुभकामनाएं स्वीकार करें.

Sawai Singh Rajpurohit said...

यह लोग जो इसके साथ खड़े
सब फ्रेम में अच्छे लगते हैं
पर चहकती सी वह आम हँसी
सब फ्रेम बदलना जानती है

क्या बात है बहुत खूब

vikas garg said...

बहुत सुन्दर अभिवयक्ति
विकास गर्ग
vikasgarg23.blogspot.com