Monday, May 02, 2011

निवेदन

कुछ नया लिखो....

जब गिरा था घोंसला
जग उठा तब हौसला
इक तरफ बाढ़ थी
और इक तरफ नाव थी

अकस्मात जब हुए
सब खड़े साथ थे
बाल बाल बचा लिया
वो बाल था किसी और का


आँसुओं की धार से
आस की फसल उगा रहे
अर्थ सार्थक हो गया
भूख जब उससे मिटी

हाट में जब बम फटा
हाथ शरीर से कटा
उँगली पकड़ सहमी खड़ी
बेहोश थी पर बच गई

रौशनी प्यार की
इस कदर थी हर जगह
रात थी गहरी बहुत
पर रास्ते सब साफ थे

शहर गिरा और नीँव भी
घरों की छत गिर गई
नीड़ किंतु बच गये
जो स्नेह से बने

बहुत हुआ

खबर की कब्र पर
रोज़ फूल चढ़ रहे
कुछ अंक खप गये
कुछ रोज़ मर रहे
.....
कलम से तुम्हारे
सृजन हो, निर्माण हो
.....
उम्मीद लिखो
गीत लिखो
हँसी लिखो
बेबसी के बावजूद
मिली हर खुशी लिखो
...............
कुछ नया लिखो

5 comments:

निर्मला कपिला said...

उम्मीद लिखो
गीत लिखो
हँसी लिखो
बेबसी के बावजूद
मिली हर खुशी लिखो
बहुत खूब बस लिखते रहो\ शुभकामनायें।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

उम्मीद लिखो
गीत लिखो
हँसी लिखो
बेबसी के बावजूद
मिली हर खुशी लिखो
...............
कुछ नया लिखो

बहुत सकारात्मक रचना ...

prabha said...

गहरे भावों की सरल शब्दों में सुन्दर अभिव्यक्ति....."कुछ नया लिखो".

सचमुच बेजी जी,मेरी भी यही दुआ है....
अन्तस् में तुम्हारे जो छिपा है..
उसे शब्द मिलते रहें.. और
कलम से तुम्हारे.. सृजन हो..
नित नया निर्माण हो।
जग में तुम्हारा नाम हो....।।

डॉ .अनुराग said...

कुछ टुकड़े बेहद अच्छे है..