Thursday, May 05, 2011

ऊब

होता है ना ऐसा

कोई दिन

बहता हुआ

इकट्ठा होने लगता है

किसी कीचड़ भरे

डबरे की तरह

रुका हुआ

.........



सोचती हूँ

साथ होते

तो शायद

चप्पल खोल

कुछ देर फुदकते

और दिन आगे बढ़ जाता

.................

11 comments:

वन्दना said...

बहुत सुन्दर ख्याल।

Kailash C Sharma said...

बहुत खूब..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह!
ऊब के माध्यम से मनोभावों का सुन्दर चित्रण किया है आपने!

वाणी गीत said...

बोरियत पर भी इतना सुन्दर लिखा जा सकता है ...
आश्चर्य !

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सम्मोहित करते मासूम ख्याल...... बहुत सुंदर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत ख़याल

mridula pradhan said...

pyara laga.

udaya veer singh said...

swapnil sansar ke mukt uddgar . badhayi ji .

Prakash Jain said...

kya baat...kya baat...kya baat !!!
sundar :-)

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

अच्छी लगी आपकी कविता.
---------------------------------------
आपकी एक पोस्ट की हलचल आज यहाँ भी है

dipak kumar said...

very nice
chhotawriters.blogspot.com