उसकी सोहबत में कोई कमी तो नहीं
कस के पकड़ा था हाथ उसने भी
मेरे साथ को भी विश्वास था बहुत...
बस इसीलिए साथ पलना चाहा
किंतु....
इमारत पर अगर पेड़ उगना चाहे...
दरार पड़ती है....कमज़ोर करती है....
पेड़ भी देर सबेर सूख ही जाता है
ना जड़ें टिकती हैं...
ना बुनियाद ही सँभलती है...
.....................
फिर भी यकीन है तुझको अगर
साथ निभाने की जिद भी मन में ठानी है
शायद निभ भी जाये...किसे खबर
अपवाद से हम कहाँ इनकार करते हैं
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3 comments:
रचना और भाव दोनों ही सुन्दर हैं!
बहुत खूब ... अच्छी पेशकश
बेहद गहरे अर्थों को समेटती खूबसूरत और संवेदनशील रचना. आभार.
सादर,
डोरोथी.
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